हिंदी साहित्य के हस्ताक्षर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी की 138वीं जयंती पर विशेष

बस्ती के लाल आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी से मेरा पहला परिचय 13 साल की उम्र में हुआ था

By : अशरफ अली बस्तवी

आज से कोई 29 वर्ष पूर्व अपने बचपन में लगभग 13 साल की उम्र में बस्ती जिले की जिस महान विभूति से मेरा पहला परिचय हुआ उनका नाम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल है .आदरणीय शुक्ल जी से मेरा परिचय बस्ती रेलवे स्टेशन के पूछ ताछ खिड़की  पर 1989 में हुआ और फिर यह सिलसिला चल पड़ा मैं जब जब बस्ती रेलवे स्टेशन जाता उनके के साथ समय गुजारता ,उनके बारे यह जानकर कि बहुत बड़े लेखक हैं बहुत प्रेरित होता,मन ही मन में ख्याल उभरता कि एक व्यक्ति लेखक कैसे बनता है ?

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी की 138वीं जयंती
कल 4 अक्टूबर को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी की 138वीं जयंती मनाई गई है ,साहित्य जगत के इस सपूत ने उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के अगौना में 4 ओक्टूबर 1884 को जन्म लिया , हिंदी साहित्य के आकाश पर अपनी अनमिट छाप छोड़ी है हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के ज़िक्र के बिना मुकम्मल नहीं हो सकता . हिंदी साहित्य का यह चिराग 2 फ़रवरी 1941 तक रोशन रहा .

इस अफरातफरी में कहीं खो न जाऊं

मुझे अपना पहला रेल सफ़र अच्छी तरह याद है उसकी एक एक बात याद है , रेलवे के सफ़र का मुझे पहला अनुभव बहुत बचपन में ही हो गया था मई की कोई तारिख थी जब मैंने ‘गोरखनाथ एक्सप्रेस ‘ जो अब ‘कुशीनगर एक्सप्रेस’ है से भैय्या भाभी के साथ पहला सफ़र किया था .भैय्या ने मुझे एहतियातन कोच नंबर जो याद करा दिया था आज भी याद हैं कोच नंबर 9016 था .

वो भी क्या दिन थे ?

तब तक ट्रेनों में पानी की बोतल बेचने का चलन शुरू नहीं हुआ ,हर यात्री का अपना कूलिंग थर्मस हुआ करता था और गाड़ी रुकते ही सबसे पहले हर यात्री स्टेशन पर लगी शीतल पेय जल की टोंटियों से पानी स्टॉक करता ,इस अफरातफरी में कहीं मैं खो न जाऊं इस लिए भय्या ने कोच नंबर रटा दिया था ,इस प्रकार मेरा पहला सफ़र बॉम्बे का हाफ टिकेट पर हुआ था . उसके बाद से 2002 तक दो तीन साल छोड़ कर सभी गर्मी की छुट्टी मुंबई में ही गुज़री, आहा ! वो भी क्या दिन थे ?

1 रू प्रति घंटा के किराये पर ली गई साइकिल

हमारे परिवार और गाँव के  युवा रोज़गार के तलाश में 1970 के दशक में मुंबई कूच कर गए थे और फिर वहीँ पहले नौकरी की फिर अपना कारोबार जमाया और यहीं घर परिवार भी बसा लिया और अब मुकम्मल तौर पर मुबईकर हो चुके हैंगाँव के घर पर बुज़ुर्ग और छोटे भाई बहन ही रह गए उन्ही में से एक हम भी थे ,पढ़ते गाँव में थे गर्मी की छुट्टियां भिन्डी बाज़ार  नागपाड़ा के मस्तान तालाब ग्राउंड और आस पास की गलियों में 1 रू प्रति घंटा के किराये पर ली गई साइकिल दौड़ाते गुज़रतीं .

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