उमर गौतम के खिलाफ मीडिया ट्रायल की झलकियाँ

इस्लाम धर्म का प्रचार करने वाले उमर गौतम को 20 जून को गिरफ़्तार किया गया था

 

नयी दिल्ली : (एशिया टाइम्स/शादाब खान की रिपोर्ट)
इस्लाम धर्म का प्रचार करने वाले उमर गौतम को यूपी पुलिस ने 20 जून को गिरफ़्तार कर लिया। उमर गौतम पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने 1,000 लोगों का जबरन धर्मांतरण कराया है। उमर ख़ुद एक हिन्दु परिवार में पैदा हुए थे और 20 साल की उम्र में उन्होंने इस्लाम क़ुबूल लिया था। उमर के ख़िलाफ़ अभी तक कोई सबूत पेश नहीं किया गया है। इसके बावजूद उनके ऊपर मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया गया। मीडिया ने उमर को धर्मांतरण गैंग का मास्टरमाइंड से लेकर आईएसआई एजेंट तक कह डाला। दिन-रात मुस्लिम विरोधी एजेंडा फैलाने वाली मीडिया ने उमर के ख़िलाफ़ यह कड़वे अल्फ़ाज़ बिना किसी सबूत के कहे हैं।
ज़ाहिर है कि उमर गौतम को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक कोर्ट में उनपर लगे इलज़ाम साबित न हो जाएं। लेकिन मीडिया पुलिस के बयान को इस तरह से दिखा रही है जैसे यह सब बातें साबित हो गई हों। उमर गौतम की गिरफ़्तारी पर ज़ी न्यूज़ ने जो ख़बर लिखी उसकी हेडलाइन सुनिये।

“जबरन धर्म परिवर्तन कराने वाले 2 लोग गिरफ्तार, 1000 से ज्यादा धर्मांतरण करने का आरोप”

इस हेडलाइन से यह कहीं नहीं लग रहा कि उमर गौतम के ऊपर सिर्फ़ आरोप लगे हैं। हो सकता है कि ज़ी न्यूज़ ने अपनी निजी अदालत में सुनवाई कर उमर गौतम के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुना दिया हो। हिन्दी न्यूज़ वेबसाइट भास्कर ने तो सीधा उमर गौतम को पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का एजेंट बता दिया। अपनी हेडलाइन में भास्कर ने लिखा-

“पाक ख़ूफ़िया एजेंसी आईएसआई की फ़ंडिंग पर धर्म परिवर्तन करने वाले दो मौलाना गिरफ़्तार”

इस हेडलाइन में उमर गौतम का नाम आईएसआई से जोड़ दिया गया। क्या इससे यह सवाल नहीं उठता कि सरकारी संस्थाओं की निगरानी के बावजूद इस्लामिक दावाह सेंटर विदेश से फ़ंडिंग कैसे ले रहा था? सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर एटीएस अभी तक यह साबित नहीं कर पाई है तो मीडिया इस तरह की हेडलाइन क्यों लिख रही है।
आप सोचेंगे कि यह मीडिया घराने सत्तारूढ़ पार्टी के इशारों पर मुस्लिम-विरोधी एजेंडा चलाते हैं, इनसे और क्या उम्मीद की जाए। लेकिन ईमानदारी का दावा करने वाले मीडिया पोर्टल भी उमर गौतम के ख़िलाफ़ अपना पूर्वाग्रह नहीं छुपा पाए। द प्रिंट ने जो ख़बर प्रकाशित की उसकी हेडलाइन में उमर को धर्मांतरण गिरोह का सदस्य बताया। वहीं दूसरी तरफ़ द लल्लनटॉप भी उमर गौतम पर विदेशी फ़ंडिंग का आरोप लगाने से बाज़ नहीं आया।
हैरत की बात है कि गिरफ़्तारी के बाद से ही मीडिया 1,000 लोगों के जबरन धर्मांतरण की बात कर रहा है लेकिन अब तक वह एक भी ऐसे व्यक्ति को पेश नहीं कर पाया है जिसका धर्म परिवर्तन जबरन कराया गया हो। अब तक जो मामले सामने आये भी हैं वो यही कह रहे हैं कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से इस्लाम को अपनाया है।
ऐसा पहली बार नहीं है कि मीडिया ने मुसलमानों को ख़िलाफ़ इस तरह का ट्रायल चलाया हो। पिछले साल तबलीग़ी जमात को भी मीडिया ने इसी तरह निशाना बनाया था। हालांकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने मीडिया को फटकार लगाते हुए कहा था कि जमात को बली का बकरा बनाया जा रहा है। उम्मीद है कि उमर गौतम के मामले में भी न्यायपालिका मीडिया के साथ इसी तरह का रवैया अपनाएगी।

 

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