उदयपुर टेल्स ने रचा इतिहास, दास्तानगोई दिग्गज और गायन कथा वाचन गुरु आए एक साथ
डॉ.ममता धवन ,दिल्ली विश्व विद्यालय
दास्तानगोई उर्दू मैं और गायन कथा वाचन हिंदी में कहानी कहने की भारतीय लोक कल हैं। सय्यद साहिल आग़ा आज के समय की दास्तानगोई में अपना विशेष स्थान रखते हैं। साहिल जी, की खासियत है कि ये दास्तानगोई के साथ क्षेत्र और समाज को देखते हुए नए प्रयोग भी करते हैं किंतु इस बात का भी पूरा ध्यान रखते हैं कि दास्तानगोई का मूल स्वरूप कहीं आहत न हो।
‘उदयपुर टेल्स’ के तीन दिवसीय साहित्यिक उत्सव (12-14 जनवरी) के अंतर्गत उनका एक ऐसा ही नवीन प्रयोग देखने को मिला। उदयपुर में दास्तान की विशेष प्रस्तुति के लिए उन्होंने राजस्थान के ही महान लोक कथा लेखक विजयदान देथा की कहानी श्रद्धांजलि स्वरुप 'दुविधा' पर अपनी दास्तान तैयार की। यह कहानी ओके रूप से स्त्रियों की शारीरिक और मानसिक स्वतंत्रता की बात करती है। बरसा-बरस गुजर जाने के बाद भी यह गाथा आज भी जीवंत है जैसे यह आज के समय के स्वरूप लिखी गई हो, शायद यही भारतीय लोक गाथाओं एवं कलाओं की विशेषता है कि वह जितना पुरानी होता जाति है उतना ही उनकी जड़ एक विशाल बरगद की तरह धरती स्वरूप हृदय के भीतर समाती जाती है।
इस कहानी में हर किरदार अपनी एक दुविधा से जूझ रहा है। चाहे वह दुल्हन हो, भूत हो, या व्यापारी पति। भूत की मनन दशा ऐसी है कि, एक भूत होकर भी उसे एक मनुष्य से प्यार हो जाता है। एक दुल्हन, पति की जगह भूत से प्यार कर बैठती है। जो कभी उसे हासिल ही नहीं हो सकता। और एक पति जो धन और व्यापार के लोग में पत्नी को अकेला छोड़ पदेस पलायन करता है। कहानी में भूत केवल एक प्रतीक है जिसकी छाया में दर्शन अपने हृदय के पटल पर कई परछाई देख पाते हैं, जो इस कहानी को विशेष बनती है।
बहरहाल, दुविधा का नाम सुनते ही जहां विजयदान देथा जी का स्मरण होता है वहीं नाट्य प्रेमियों के हृदय में एक और खूबसूरत- सा नाम उभरता है, नाट्य कलाकार एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली में अध्यापक अजय कुमार जी का। आप 'दुविधा' कहानी को एकल अभिनय द्वारा प्रस्तुत करते आए हैं और उनकी यह प्रस्तुति दर्शकों को अभिभूत करती रही है। साहिल आग़ा ने यही एक नया प्रयोग किया। दास्तानगोई के साथ कथा- गायन- वाचन का मिश्रण। यानी एक तरफ मंच पर दास्तानगो साहिल थे तथा दूसरी तरफ़ मंच पर हारमोनियम तथा अन्य वाद्य यंत्रों का समीकरण बिठाने अजय कुमार प्रस्तुत थे जो स्वयं इस कथा के कथा वाचक हैं तथा अब तक इसकी अनेकों प्रस्तुतियां कर चुके हैं। इस दास्तानगोई में एक ईमानदारी यह बरती गई कि दर्शकों को पहले ही अपने इस नवीन प्रयोग की जानकारी साहिल आग़ा अपने मंच से देते हैं तथा अजय कुमार को अपना गुरू स्वीकार करते हैं। यह अद्भुत दास्तानगोई थी, संगीत पर अजय कुमार जी इस दास्तान को बखूबी आधार दे रहे थे। बीच बीच में गुरू शिष्य का संवाद वातावरण को आनंददायक बना रहा था। दर्शक मंत्र मुग्ध भी थे और अंत में उन्होंने खड़े होकर तालियां बजाईं एवं प्रशंसा के फूल बिखेरे।
(दुनिया की सारी दौलत अतीत को वापस नहीं ला सकती है, उदयपुर टेल्स में रचा इतिहासदास्तानगोई दिग्गज और गायन कथा वाचन गुरु आए एक साथ।
दास्तानगोई उर्दू मैं और गायन कथा वाचन हिंदी में कहानी कहने की भारतीय लोक कल हैं। सय्यद साहिल आग़ा आज के समय की दास्तानगोई में अपना विशेष स्थान रखते हैं। साहिल जी, की खासियत है कि ये दास्तानगोई के साथ क्षेत्र और समाज को देखते हुए नए प्रयोग भी करते हैं किंतु इस बात का भी पूरा ध्यान रखते हैं कि दास्तानगोई का मूल स्वरूप कहीं आहत न हो। ‘उदयपुर टेल्स’ के तीन दिवसीय साहित्यिक उत्सव (12-14 जनवरी) के अंतर्गत उनका एक ऐसा ही नवीन प्रयोग देखने को मिला। उदयपुर में दास्तान की विशेष प्रस्तुति के लिए उन्होंने राजस्थान के ही महान लोक कथा लेखक विजयदान देथा की कहानी श्रद्धांजलि स्वरुप 'दुविधा' पर अपनी दास्तान तैयार की। यह कहानी ओके रूप से स्त्रियों की शारीरिक और मानसिक स्वतंत्रता की बात करती है। बरसा-बरस गुजर जाने के बाद भी यह गाथा आज भी जीवंत है जैसे यह आज के समय के स्वरूप लिखी गई हो, शायद यही भारतीय लोक गाथाओं एवं कलाओं की विशेषता है कि वह जितना पुरानी होता जाति है उतना ही उनकी जड़ एक विशाल बरगद की तरह धरती स्वरूप हृदय के भीतर समाती जाती है। इस कहानी में हर किरदार अपनी एक दुविधा से जूझ रहा है।
चाहे वह दुल्हन हो, भूत हो, या व्यापारी पति। भूत की मनन दशा ऐसी है कि, एक भूत होकर भी उसे एक मनुष्य से प्यार हो जाता है। एक दुल्हन, पति की जगह भूत से प्यार कर बैठती है। जो कभी उसे हासिल ही नहीं हो सकता। और एक पति जो धन और व्यापार के लोग में पत्नी को अकेला छोड़ पदेस पलायन करता है। कहानी में भूत केवल एक प्रतीक है जिसकी छाया में दर्शन अपने हृदय के पटल पर कई परछाई देख पाते हैं, जो इस कहानी को विशेष बनती है। बहरहाल, दुविधा का नाम सुनते ही जहां विजयदान देथा जी का स्मरण होता है वहीं नाट्य प्रेमियों के हृदय में एक और खूबसूरत- सा नाम उभरता है, नाट्य कलाकार एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली में अध्यापक अजय कुमार जी का। आप 'दुविधा' कहानी को एकल अभिनय द्वारा प्रस्तुत करते आए हैं और उनकी यह प्रस्तुति दर्शकों को अभिभूत करती रही है।
साहिल आग़ा ने यही एक नया प्रयोग किया। दास्तानगोई के साथ कथा- गायन- वाचन का मिश्रण। यानी एक तरफ मंच पर दास्तानगो साहिल थे तथा दूसरी तरफ़ मंच पर हारमोनियम तथा अन्य वाद्य यंत्रों का समीकरण बिठाने अजय कुमार प्रस्तुत थे जो स्वयं इस कथा के कथा वाचक हैं तथा अब तक इसकी अनेकों प्रस्तुतियां कर चुके हैं। इस दास्तानगोई में एक ईमानदारी यह बरती गई कि दर्शकों को पहले ही अपने इस नवीन प्रयोग की जानकारी साहिल आग़ा अपने मंच से देते हैं तथा अजय कुमार को अपना गुरू स्वीकार करते हैं। यह अद्भुत दास्तानगोई थी, संगीत पर अजय कुमार जी इस दास्तान को बखूबी आधार दे रहे थे। बीच बीच में गुरू शिष्य का संवाद वातावरण को आनंददायक बना रहा था। दर्शक मंत्र मुग्ध भी थे और अंत में उन्होंने खड़े होकर तालियां बजाईं एवं प्रशंसा के फूल बिखेरे।(दुनिया की सारी दौलत अतीत को वापस नहीं ला सकती है, 'दुविधा' उन लोगों के साथ लगती है जो भौतिक मूल्यों पर समय और मानवीय रिश्तों को महत्व देते हैं।

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