बारूद के ढेर पर कूटनीति – ईरान, अमेरिका और मध्य-पूर्व का भविष्य

ओमान में होने वाली बातचीत: कूटनीति या युद्ध की दहलीज़?

 

डॉ. आसिफ नवाज़

 असिस्टैंट प्रोफेसर, हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जामिया हमदर्द, नई दिल्ली


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 8 अप्रैल 2025 को घोषणा की थी कि आने वाले शनिवार, यानी 12 अप्रैल को ओमान में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक अहम "उच्च स्तरीय मुलाक़ात" होने जा रही है। अमेरिकी प्रशासन इसे "प्रत्यक्ष मुलाक़ात" कह रहा है, जबकि ईरान इसे ओमानी मध्यस्थता के ज़रिए "परोक्ष वार्ता" बता रहा है। ट्रंप ने सोमवार को धमकी भरे लहजे में कहा था, "मुझे लगता है कि अगर ईरान के साथ बातचीत सफल नहीं होती, तो वह बहुत बड़े खतरे में पड़ जाएगा। और मुझे 'बड़ा खतरा' जैसे शब्द कहना पसंद नहीं, लेकिन कहना पड़ रहा है, क्योंकि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते।"

यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य-पूर्व में ग़ज़ा पर इज़राइल की बर्बर कार्रवाई थमने का नाम नहीं ले रही है और ईरान-इज़राइल तनाव चरम पर है।

खुद को "डील मेकर" कहने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के लिए एक नया समझौता करना चाहते हैं। वहीं ईरान, जो बीते दो दशकों से गंभीर आर्थिक प्रतिबंधों के बोझ तले दबा हुआ है और रणनीतिक रूप से कमजोर होता जा रहा है, इस दबाव से निकलने और वैश्विक टकराव से बचने की कोशिश में है।

हालांकि, यह रस्साकशी केवल परमाणु कार्यक्रम से नहीं शुरू होती — यह दो देशों के बीच दशकों की दुश्मनी, अरब वसंत के बाद की राजनीतिक उथल-पुथल और भू-राजनीतिक हितों की एक जटिल कहानी है।


ईरान-अमेरिका रिश्तों की कड़वाहट: ऐतिहासिक जड़ें और गहराई

अमेरिका और ईरान के बीच तल्ख़ रिश्तों की शुरुआत 1953 से मानी जाती है, जब सीआईए ने ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दक की सरकार को गिरा दिया था। मोसद्दक ने 1951 में ईरान के तेल संसाधनों का राष्ट्रीयकरण किया था, जिससे पश्चिमी हितों को खतरा महसूस हुआ। इस तख्तापलट के बाद पश्चिम समर्थक शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की तानाशाही सत्ता फिर से बहाल हुई।

इस अमेरिकी हस्तक्षेप ने ईरानी जनता के दिल में पश्चिम के प्रति गहरी नफरत भर दी, जिसे वे अपनी संप्रभुता पर हमला मानते थे। यह घृणा केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि एक राष्ट्रीय चेतना बन गई जो आज भी ईरानी राजनीति का हिस्सा है। 1979 में इस असंतोष ने इस्लामी क्रांति का रूप ले लिया।

इस्लामी क्रांति के बाद, जब अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में शाह की सत्ता का अंत हुआ और एक इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, ईरान ने पश्चिमी प्रभुत्व को पूरी तरह नकार दिया। उसी दौरान तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर ईरानी छात्रों ने कब्ज़ा कर 52 अमेरिकी कर्मचारियों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा। इसे 'बंधक संकट' कहा गया — और इसने दोनों देशों के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी कर दी।


1980 का ईरान-इराक युद्ध और अमेरिका की भूमिका

ईरान-इराक युद्ध ने इस दुश्मनी को और गहरा किया। जब इराक के सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया, तो अमेरिका खुलकर इराक के समर्थन में आया। उसने हथियार, वित्तीय सहायता और खुफिया जानकारियाँ दीं। इस युद्ध में लाखों ईरानी मारे गए। 1988 में जब अमेरिकी युद्धपोत ने एक ईरानी यात्री विमान गिरा दिया और 290 नागरिक मारे गए, तो ईरान ने इसे जानबूझकर की गई आक्रामकता माना और अमेरिका को 'महाशैतान' कहना शुरू किया।


2001 के बाद की स्थिति: 'आतंक के खिलाफ युद्ध' और परमाणु कार्यक्रम

9/11 के बाद अमेरिका ने आतंक के खिलाफ युद्ध शुरू किया। शुरू में ईरान ने अफगानिस्तान में अमेरिका को सहयोग की पेशकश की, लेकिन 2002 में जॉर्ज बुश ने ईरान को 'बुराई का धुरी' (Axis of Evil) कह दिया। इसके बाद ईरान ने परमाणु कार्यक्रम को तेज़ किया। अमेरिका ने इसे खतरा बताया, जबकि ईरान ने इसे आत्मरक्षा का अधिकार कहा।

ईरान ने हिज़्बुल्लाह और हमास जैसी प्रॉक्सी ताकतों को समर्थन दिया, जिससे उसका प्रभाव क्षेत्र में बढ़ा और इज़राइल-सऊदी अरब जैसे देशों के लिए असहनीय बन गया।


JCPOA (2015) से लेकर ट्रंप की वापसी तक

2015 में ओबामा प्रशासन ने परमाणु समझौता JCPOA पर दस्तखत किए। ईरान को राहत मिली, लेकिन इज़राइल-सऊदी अरब इससे संतुष्ट नहीं थे क्योंकि इसमें ईरान की मिसाइल और प्रॉक्सी गतिविधियों को नहीं रोका गया।

2018 में ट्रंप ने इसे 'सबसे खराब समझौता' बताकर खत्म कर दिया और 'अधिकतम दबाव' की नीति अपनाई, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई और वह फिर से यूरीनियम संवर्धन की ओर लौट आया।

2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या ने दोनों देशों को युद्ध के कगार पर पहुँचा दिया।


2025 में फिर आमना-सामना: एक और मौका या नया संकट?

आज, 2025 में, ट्रंप अपनी दूसरी राष्ट्रपति अवधि के चौथे महीने में हैं और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उनकी नीति फिर सक्रिय हो गई है। इस बार ट्रंप प्रशासन एक स्थायी समाधान चाहता है, जिससे इस पुराने विवाद को सुलझाया जा सके।

ओमान में हो रही वार्ता को लेकर कहा जा रहा है कि ईरान का 'ब्रेकआउट टाइम' — यानी हथियार-योग्य यूरेनियम (90%) तक पहुँचने का समय — अब सिर्फ कुछ ही हफ्तों का रह गया है, जबकि 2015 में यह करीब 12 महीने था।

इसका कारण है — ईरान का बढ़ता हुआ 60% संवर्धित यूरेनियम भंडार और IR-6, IR-9 जैसे आधुनिक सेंट्रीफ्यूज का प्रयोग, जो इस प्रक्रिया को काफी तेज़ कर सकते हैं।

ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराक़ची ने 8 अप्रैल 2025 को Washington Post में एक लेख में लिखा:

"ईरान एक व्यवहार्य समझौते के लिए पूरी गंभीरता से तैयार है। हम शनिवार को ओमान में परोक्ष बातचीत के लिए एकत्र हो रहे हैं। यह मुलाकात एक ऐतिहासिक अवसर है और दोनों पक्षों के लिए एक बड़ी परीक्षा भी।"

वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता टामी ब्रूस ने कहा, "यह कोई औपचारिक बातचीत नहीं, बल्कि एक मुलाक़ात है, जिसका उद्देश्य प्रारंभिक संपर्क बनाना है, कोई अंतिम समझौता नहीं।"


निष्कर्ष: बारूद के ढेर पर भविष्य

इतिहास, अविश्वास और क्षेत्रीय राजनीति के बुनियादी तनावों के साथ यह बातचीत हो रही है। 1953 का तख्तापलट, 1979 की क्रांति, 1980 का युद्ध, 2015 का समझौता और 2025 की परमाणु दौड़ — सब एक ऐसे मोड़ पर इकट्ठा हो गए हैं, जहाँ एक छोटा-सा क़दम भी एक नए संकट की ओर ले जा सकता है।

अब देखना यह है कि ओमान में यह कूटनीति वास्तव में शांति की ओर कोई रास्ता खोल पाएगी या एक और बारूद के ढेर को चिंगारी देने का काम करेगी।


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draasifnawaz@gmail.com

 

नोट : यह लेखक के अपने विचार  हैं ,इस से एशिया टाइम्स का सहमत होना जरूरी नहीं है 

             (यह लेख AI  की मदद से  उर्दू से हिंदी में रूपांतरित किया गया है  )

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