क्या भारत आत्मनिरीक्षण के लिए तैयार है ?

प्रधानमन्त्री में हिम्मत नहीं है की चीन के नाम पर चूं भी कर सकें

जावेद अशरफ खान

2014 ने भारत को एक नए युग में प्रवेश कराया।  दुष्प्रचार का युग, झूठ, गलत सूचना, लोकतांत्रिक संस्थानों पर कब्ज़ा, नौकरशाहों का आत्मसमर्पण और मीडिया सत्तारूढ़ व्यवस्था की PR एजेंसियों में बदल रहा है। हाँ, यह नरेंद्र का युग है। कानून का राज, नैतिकता, नैतिक आचरण या संवैधानिक परंपराओं के लिए कोई जगह नहीं है।

इस स्थिति का कारण पूरी तरह से एक अलग विषय है, मैं इस पर कभी बाद में चर्चा करना पसंद करूंगा और मुझे लगता है कि कुछ समान विचारधारा वाले चिंतित नागरिकों ने इसके बारे में पहले ही लिखा होगा।

वर्तमान शासन द्वारा भारत का एक बार नहीं बल्कि कई मौकों पर मज़ाक उड़ाया गया है और यह नोटबंदी से शुरू होता है

दोषपूर्ण जीएसटी कार्यान्वयन, अर्थव्यवस्था का कुप्रबंधन, कोविड महामारी का घोर कुप्रबंधन, संसदीय प्रक्रियाओं के लिए शून्य सम्मान और बिना बहस और चर्चा के बिलों और कानूनों को थोपना, निरंतर मानवाधिकारों का उल्लंघन, विदेश नीति को मलियामेट करना जिसने भारत को अलग स्तर पर रखा था और उसकी सॉफ्ट पावर ने जीत हासिल की थी और भारतीय ज़मीन में चीनी घुसपैठ के सामने प्रधान सेवक  के घोर आत्मसमर्पण को भी जोड़ना चाहिए उनमें में हिम्मत नहीं है की चीन के नाम पर चूं भी कर सकें।

बिकी चुकी  मीडिया की मदद से, शासक वर्ग ने यह सुनिश्चित किया है कि ये वास्तविक मुद्दे भारत के आम लोगों तक नहीं पहुंचें क्योंकि वे जनता को विभाजनकारी और सांप्रदायिक एजेंडे में व्यस्त रखते हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अनेक विपक्षी दल मूक दर्शक बने हुए हैं, राहुल गांधी, शशि थरूर, ममता बनर्जी जैसे कुछ नेताओं और कुछ हद तक कन्हैया कुमार, अजय कुमार लल्लू और इमरान प्रतापगढ़ी जैसे कुछ उभरते युवा नेताओं को छोड़कर, जो सरकार पर सवाल उठाते रहे और हर विनाशकारी कदम पर विरोध करते हैं लेकिन उनकी आवाज़ भी अधिकांश मीडिया चैनलों द्वारा नहीं कवर की जाती है।

जनता क्या कर सकती है?

जब तानाशाह टाइप नेता सत्ता पर काबिज़ हो जाते हैं, तो वे यथासंभव लंबे समय तक उस पर टिके रहने की कोशिश करते हैं और विपक्षी आवाजों को दबाने के लिए अत्याचारी हो जाते हैं।

आंदोलनों के माध्यम से केवल लोगों की सामूहिक शक्ति ही उन्हें हटा सकती है। उदाहरण के लिए, किसान आंदोलन है, जीवन के हर क्षेत्र के लोग जो नौकरियां जाने, व्यापार और अवसरों के नुकसान से पीड़ित हैं, चाहे वे जिस सेक्टर से हों MSME, व्यापार क्षेत्र, पर्यटन क्षेत्र, सेवा क्षेत्र आदि के लोगों को चाहिए कि सत्ता की जनविरोधी गलत पालिसियों ख़िलाफ आंदोलन चालएं

अकेले राजनीतिक दल उन्हें नहीं हरा सकते क्योंकि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावी माहौल  स्थान चाहिए ताकि वह जनहित के मुद्दों पर लोगों के वोट हासिल कर अपने प्रतिद्वंद्वी को हरा सकें।

जिस मुश्किल स्थिति में हम हैं, ऐसी सरकार को हराने के लिए हर नागरिक को लड़ाई लड़नी है, जिसने भारत और उसके नागरिकों का व्यापक नुकसान किया है। लोगों को अब  इस दिशा में सोचना शुरू करना चाहिए और 2022 यूपी विधानसभा चुनाव फासीवादियों को सत्ता से बाहर करने और 2024 में आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सभी साहस और शक्ति को इकट्ठा करने का सही अवसर  यही है।

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