इस बुजुर्ग ने महिंद्रा कंपनी को छोड़कर सैंडहर्स्ट रोड स्टेशन पर मोची का काम करना पसंद किया, लेकिन आत्म-सम्मान से समझौता नहीं किया।

मुंबई के सैंडहर्स्ट रोड स्टेशन पर 47 साल से बैठे मोची से एशिया टाइम्स की मुलाकात

मुंबई: (अशरफ अली बस्तवी की रिपोर्ट)

ये बुजुर्ग मोची शकूर अली हैं, जो पिछले 47 वर्षों से मुंबई के सैंडहर्स्ट रोड लोकल ट्रेन स्टेशन पर जूते सुधारने का काम कर रहे हैं।

आज जब उन पर नजर पड़ी तो मेरे कदम ठहर गए। एक पल के लिए दिमाग पर जोर डाला कि यह वही चेहरा है जो 25 साल पहले रोज नजर आता था। मैं उनके पास बैठ गया और बातें शुरू हुईं। उनकी बातों में एक ऐसी कहानी छुपी थी जिसने मुझे हैरान कर दिया।

शकूर चाचा ने बताया कि उनका ताल्लुक बिहार के अररिया जिले से है। वह 1966 में मुंबई आए थे और यहां जीप बनाने वाली प्रसिद्ध कंपनी, महिंद्रा में नौकरी शुरू की। वह अपनी नौकरी से संतुष्ट थे और उनके कुछ दोस्त भी वहीं काम करते थे। काम का माहौल अच्छा था और जिंदगी आराम से कट रही थी।

लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने उनकी जिंदगी बदल दी। शकूर चाचा के एक दोस्त की मैनेजर से कहासुनी हो गई। मैनेजर ने उनके दोस्त की बहन के लिए बेहद आपत्तिजनक शब्द कहे। यह बेइज्जती शकूर चाचा और उनके दोस्तों के लिए असहनीय थी। उनकी आत्म-सम्मान ने उन्हें मजबूर कर दिया और उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया।

शकूर चाचा ने अपने तीन दोस्तों के साथ कंपनी से इस्तीफा दे दिया। इस फैसले के बाद उनके सामने नई चुनौतियाँ थीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने सैंडहर्स्ट रोड स्टेशन पर मोची का काम शुरू किया। यही काम उनका रोज़गार बना और आज भी वह उसी जगह बैठकर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं।

जब मैंने उनसे पूछा कि इतने वर्षों बाद क्या वे अपने फैसले पर पछताते हैं? तो उनकी आँखों में एक दृढ़ संकल्प और संतोष झलक रहा था।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा:
"बेटा, जो आत्म-सम्मान के खिलाफ हो, उसे छोड़ देना ही बेहतर है। मैं जिस हाल में हूँ, अल्लाह का शुक्रगुजार हूँ। "

उन्होंने आगे बताया कि जब उन्होंने यहां काम शुरू किया था, तब रेलवे को रोज़ एक रुपया किराया देना पड़ता था, अब 30 रुपये रोज देने पड़ते हैं, लेकिन समय के हिसाब से यह ज्यादा नहीं है, कमाई हो जाती है। तब दो आने में एक जोड़ी जूते की पॉलिश हो जाती थी, अब 20 रुपये मिल जाते हैं।

शकूर चाचा की यह कहानी उनकी ईमानदारी, आत्म-सम्मान और संघर्ष की जीवंत मिसाल है। वह न केवल एक मोची हैं बल्कि हौसले और आत्म-सम्मान का एक बड़ा सबक भी हैं।

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