जब चाचा जी और साबु ने फैमिली मेंबर की हैसियत अख्तियार कर लिया था

आज 30 वर्ष पुरानी नन्ही यादें फिर ताज़ा हो गईं

 

By : Ashraf Bastavi

कल शाम कुछ जरूरी काम से New Friends Colony Community Centre जाना हुआ.वापसी में किताबों के स्टॉल पर चाचा चौधरी और साबू पर यकायक नज़र जो पड़ी तो जम सी गई.थोड़ी देर के लिए 1990 के दशक में पहुँच गया.

चाचा जी और साबु ने स्कूली बच्चों के दरम्यान फैमिली मेंबर की हैसियत अख्तियार कर लिया था.रोज़ दोस्तों में इस बात की होड़ रहती किस ने आज कौन सी सीरीज पढ़ा ? तब इसका दाम कोई 4 रुपये था लेकिन सब के जेब खर्च इतने ना होते थे .फिर कैसे पढ़ें, इसका भी हल था Baghnagar Bazar में बर्फ वाले मेराज भाई जो खुद भी स्टूडेंट थे.मेराज भाई खरीद कर लाते और 50 पैसे 24 घंटे के लिए किराये पर देते.

May be a cartoon of text that says "Largest selling comicsi India Diamond CHACHA PRANS CHAUDHARY and TCONS SABU'S CATAPULT TOONS Diamond CHACHA RAN in India and CHAUDHARY 100 52:42 E202/20/20 E202"
जल्द खत्म करने का दबाव अलग रहता, अगर समय पर वापस ना किया तो किराया डबल हो जाता.स्कूलों में तब स्टूडेंट को Out of Course कुछ भी पढ़ने पढ़ाने का रिवाज नहीं था.

ब्लकि अगर पता चल जाय तो टीचर बहुत सख्त कार्रवाई करते जिसके बस्ते से कॉमिक्स मिल जाय उसकी खैर नहीं.
मुझे नही मालूम मेरे विज्ञान एवं वाणिज्य के साथियों ने इस से क्या सीखा लेकिन पत्रकारिता मे मुझे तो इसका खूब फायदा मिल रहा है.मैदान से Reporting के समय कहानी कहने में बड़ा लुत्फ आता है.

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शुक्रिया चाचा जी, शुक्रिया साबु, शुक्रिया  प्राण जी.

तब इस की एक कॉपी 4 रुपये था, अब एक कॉपी का दाम 100 रूपए है. बुक स्टॉल के मालिक ने कहा बाबू जी एक कॉपी रख लीजिए बहुत जल्द विलुप्त हो जाएगी. उसकी यह बात सुन पुरानी यादों को महफ़ूज़ करने के लिए दो कॉपी अपनी Library के लिए ले आया.किसी ने क्या खूब कहा आपने अंदर के बच्चे को हमेशा जिंदा रखें. ...

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