“धीरेन्द्र शास्त्री जैसे लोग अंधविश्वास और नफरत फैला पाते हैं क्योंकि सत्ता इनके साथ है!”
Dr. Naresh Gautam
भय, असुरक्षा का अपना एक समाजशास्त्र होता है और जैसे-जैसे व्यक्ति का समाजीकरण होता है, उसे धीरे-धीरे समाज भय और असुरक्षा से परिचित कराता जाता है। जो समाज जितना अधिक असुरक्षा के भाव में जीवन व्यतीत करता है, उस समाज में इस तरह के लोगों द्वारा चमत्कारी शक्तियों के माध्यम से समाज का कल्याण करने के दावे पेश करने को उतना ही प्रेरित किया जाता है। आधुनिक भारत के विकास तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद आज भी भारतीय जनमानस में साधुओं-ओझाओं, गुनिया और सयाने, जादू-टोना करने वाले आदि के प्रति विश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
इसे आधुनिक विज्ञान और राज्य की अक्षमता कहें या जनसाधारण के मन में बैठा अंधविश्वास कि आज भी ऐसी-ऐसी खबरें सुनाई दे जाती हैं, जिन पर सहज ही विश्वास नहीं हो पाता। इतना ही नहीं आत्मा को कल्याणकारी बनाने का दावा करने वाले बहुत से साधु, स्वामी, महाराज, बाबा, माताएँ और ‘भगवान’ भी यहाँ मिलते हैं जो किसी न किसी तरह अपना संबंध भारत की प्राचीन आध्यात्मिक-रहस्यवादी परंपराओं से जोड़ कर दिखाते हैं।
अलग-अलग संस्कृतियों में भय या कहें कि विश्वास के संबंध में अलग-अलग धारणाएं रही हैं। चूंकि भारतीय सांस्कृतिक ढांचे में निहित प्रतीकों के संसार की एक झलक मिलती है। उन्हीं प्रतीकों और चिन्हों के माध्यम से यह चमत्कारी लोग चमत्कार का दावा कर समाज को अंधविश्वास की ओर ले जाने का कार्य करते हैं। चूंकि इस अन्धविश्वास और आडंबर के पीछे पूंजी का बड़ा बाजार फैला है, साथ ही तथाकथित सिद्ध सिद्धेश्वर जन मानस में अपना अप्रभावी प्रभाव छोड़ते हैं, जिसके कारण इन्हें राजनीतिक संरक्षण भी बखूबी मिल जाता है क्योंकि तर्कशील होना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। वैसे ही जैसे भगवान पर भरोसा करना आसान है, और नास्तिक होना उतना ही मुश्किल। नास्तिक होने के लिए तर्कशील होने की आवश्यकता पड़ती है लेकिन आस्तिक होने के लिए किसी तर्क की आवश्यकता नहीं होती ।
चूंकि हमारी पारंपरिक ज्ञान शैली में इस तरह की तमाम प्रेक्टिस पहले से होती आ रही हैं, इसलिए चमत्कारी बाबा, साधुओं और ओझाओं का प्रभाव समाज पर बहुत तेजी से होता है। सत्ता से ज्ञान हमेशा प्रभावित होता है, जैसी सत्ता होगी ज्ञान का प्रभाव भी वैसा ही होता है, तो जाहिर सी बात है, जब भी धर्म, विश्वास और चमत्कार की बात होती है। तब सारे तर्क और विज्ञान फेल दिखाई देते हैं। वैज्ञानिक सोच के लिए दुनिया के आडंबरो और चमत्कारों से लड़ना और तर्क के आधार पर उन्हें ख़ारिज करना पड़ता है।
हाल ही में अंधविश्वास उन्मूलन समिति के अध्यक्ष श्याम मानव द्वारा धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के चमत्कारी करतबों, करनामों को चुनौती देते हुये, श्याम मानव ने चमत्कार दिखाने का अह्वान किया। लेकिन इस मामले में धीरेन्द्र शास्त्री चल रहे रामकथा आयोजन को निर्धारित समय सीमा से पहले ही छोड़ के चले गए। उसके बाद से यह घटना विमर्श का विषय बनी हुई है।
चमत्कार दिखाने वाले बाबाओं की यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले कितने ही बाबा, ओझा गुनिया, चमत्कारी होने के बावजूद आज जेल की हवा खा रहे हैं बावजूद इसके समाज में उनका प्रभाव कम होता दिखाई नहीं देता। इस तरह के व्यक्तियों के राजनीतिक संपर्क या कहें जोड़ गाठ इतनी अधिक मजबूत है कि इन पर कोई भी कानून लागू नहीं होता। बहुत जल्दी यह लोग जेल से बाहर हो जाते हैं क्योंकि इस तरह के लोगों की राजनीति के गलियारों में बहुत गहरी पैठ है। यह लोग धार्मिक आयोजनों के माध्यम से वोट बैंक तैयार करने का काम करते आ रहे हैं। यह अपने प्रभावशाली वक्तव्य से एक अलग तरह का समीकरण बनाने का कार्य करते हैं। इस समीकरण को स्थापित करने लिए एक पूरा तंत्र कार्य करने लगता है। यही वजह है कि इन बाबाओं का बाजार लगातार फलता-फूलता जाता है। समाज जितना अधिक असुरक्षा के भाव में अपना जीवन व्यतीत करता है, इस तरह के लोगों के लिए जमीन तैयार होती जाती है।

भारतीय राजनीति में बाबाओं की बड़ी दखलंदाजी दिखाई देती है। शेयर बाजार से लेकर सरकार तक कंट्रोल करने वाले चन्द्रास्वामी का नाम किसी से छुपा नहीं है। यहाँ तक कि चंद्रास्वामी का नाम राजीव गांधी हत्या कांड में आया। सेक्स, पावर और सत्ता के लिए जाने जाने वाले चंद्रा को आखिर में तिहाड़ जेल की हवा खानी पड़ी। लेकिन सत्ता के गलियारे में अपनी मजबूत पकड़ के कारण उसे बहुत दिनों तक जेल की सलाखें रोक नहीं पायी।
आसाराम से लेकर राम रहीम और जाने कितने ही बाबा और धर्मगुरु जाति, धर्म, समुदाय के नाम पर अनेक तरह की भ्रांतियाँ फैलाने वाले इन बाबाओं के चरणों में जब बड़े-बड़े नेताओं के सिर झुके हुये आशीर्वाद लेते हुये दिखाई देते हैं तो, लोगों के दिलो दिमाग में इनका प्रभाव और अधिक बढ़ा जाता है। इन 75 वर्षों में लगातार बाबाओं का बाजार चुनाव होने से पहले चमकना शुरू हो जाता है और इनका सत्ता के साथ मजबूत समीकरण दिखाई देता है।
वह अपने सभाओं, प्रवचनों के माध्यम से मॉब तैयार करने का कार्य करते हैं। यह सारे प्रवचन कहीं न कहीं राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग द्वारा और संरक्षण में प्रायोजित किए जाते हैं।
इन बाबाओं के माध्यम से जो राजनीतिक समीकरण तैयार किये जाते हैं। वह बहुत मजबूत होते हैं क्योंकि जिस देश में बेरोजगारी अपने चरम पर हो, शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा हो, जहाँ युवाओं के सामने कोई ठोस दिशा न हो, जहाँ लोग स्वास्थ्य और भोजन के लिए संघर्ष करते हों, वहाँ इन बाबाओं की जमीन बहुत उर्वरक और उपजाऊ साबित होती है। धीरेन्द्र शास्त्री जैसे लोगों का खुले तौर पर यह कहना कि आप हमारा साथ दो हम आप को हिंदू राष्ट्र देंगे। यह खुले तौर पर संविधान की मूल भावना का हनन है। लेकिन कोई भी राजनीतिक पार्टी या कोई भी राष्ट्रीय चैनल इसकी आलोचना करने के बजाए, इन बाबाओं की जयजयकार करते दिखाई देते हैं। राजनीतिक संरक्षण प्राप्त ये लोग देश के नागरिकों का उपयोग कर उन्हें अपने तरीके से इस्तेमाल करते हुये उन्मादियों की भीड़ तैयार करने का काम करते हैं। जितना अधिक समाज असुरक्षा के भाव में जीवन व्यतीत करेगा, इन जैसे चमत्कारी सयानों का बाजार चकमता रहेगा।
courtesy : https://www.youthkiawaaz.com/

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