ताकि सनद रहे…..
जावेद अशरफ़ ख़ान
जामिया, शाहीन बाग़ (दिल्ली) और घंटाघर (लखनऊ) में CAA NRC का जो आंदोलन 2019-20 में हुआ उसने देश को रास्ता दिखाया कि प्रचंड बहुमत की फासीवादी रेजीम के ख़िलाफ़ कैसे लड़ा जाये।
इस आंदोलन में शाहीन बाग के निवासियों, जामिया के स्टूडेंट्स, जाफराबाद सीलमपुर के आंदोलनकारियों, घंटाघर लखनऊ में बैठी मांओं बहनो ने वह यातनाएँ सही जिसे सुनकर एक आम इंसान काँप उठे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 21 नौजवानों ने सीधे सीने में गोलियां खायीं, राज्य प्रायोजित दिल्ली दंगे में सैकड़ों घर दुकान जला दिए गए सैकड़ों ने जान की कुर्बानी दी और एक आततायी अत्याचारी फासीवादी सरकार को 100 दिनों तक अपने शांतिपूर्ण आंदोलन से घुटने पर लादिया।
ज़ख़्मियों को अस्पताल पहुंचाते, दिल्ली पुलिस मुख्यालय का कई बार घेराव करते, डिटेन हुए साथियों को छुड़ाते, दंगा पीड़ितों को राहत सामग्री पहुँचाते और आंदोलन के साथियों के साथ क़दमताल मिलाते इन तमाम वारदातों को अपनी आँखों से देखते हुए एक तल्ख़ तजुर्बे की तरह हम ने दिल में समेट रखा है। वह सब याद करते हुए आँखे नाम भी होती हैं लेकिन हौसला और मज़बूत हो जाता है।
सच यह है की उस आंदोलन को हिंदू मुस्लिम का रंग देकर सत्ता ने बहुसंख्यक समुदाय को गुमराह करदिया, जिस तरह की मदद और सहानुभूति उनकी तरफ़ से आनी चाहिए थी वह नहीं मिली लेकिन फिर कुछ मुट्ठी भर जो साथ आए उनको दिल से सम्मान और सलाम है। मीडिया और बहुसंख्यक समाज की मेजोरिटी ने विलेन बनाया।
वक्त गुज़रा इस सरकार ने किसानो पर आक्रमण किया, किसानो ने उसी शाहीन बाग आंदोलन के रास्ते सरकार जो झुका दिया , 700 किसानो की जानें गईं , लेकिन सरकार को क़ानून वापस लेना पड़ा, गोदी मीडिया और बहुसंख्यक समाज का रवैया तब भी आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ रहा।
एक ज़िंदादिल पत्रकार ने कहा था कि सब का नंबर आयेगा तो अब नंबर भारत के भविष्य छात्रों और युवाओं का था जिन में अधिकतर वह बच्चे थे जिनके माँ बाप ने मोदी को 2-3 टर्म वोट देकर सत्ता में बिठाया था, युवाओं ने ललकारा , फासीवादी सत्ता ने लाठी, आँसू गोले और पैलेट गन का इस्तेमाल करते हुए उसी तरह का दमन दोहराया।
युवाओं के खून का एक एक क़तरा इंक़िलाब बन गया, गोदी मीडिया , राइट विंग पालतू कार्यकर्ता और अफ़सरान नतमस्तक हो गए और सरकार बहादुर ने डर के साये में सरेंडर कर दिया , मंत्री का इस्तीफ़ा हुआ और छात्रों की सभी मांगे मानी गयीं।
इन सभी आंदोलनों में शामिल और कुर्बानी देने में पेश पेश मांओं, बहनो, बच्चो और भाइयों को क्रांतिकारी सलाम है।
उस वैकल्पिक मीडिया को भी दिल से सलाम जिन्होंने अपनी नौकरी को लात मारते हुए यूट्यूब और सोशल मीडिया के ज़रिए इन आंदोलनों की सच्चाई देश के सामने रखी।
यूँही उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़ ना उनकी हार नई है ना अपनी जीत नई

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